समाचार पत्र और मेरे विचार

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पिछले कुछ महीनों मैं मुझे ऐसा लगने लगा था कि समाचार पत्रों में केवल राजनीतिक अथवा अपराधिक समाचारों के अतिरिक्त और कोई समाचार आना ही बंद ही हो गए हैं या यह भी हो सकता है कि शायद मैंने ही समाचार पत्र पढ़ने में आज से पहले कभी इतनी रुचि ही न ली हो। इसलिए मुझे पहले कभी यह महसूस ही नहीं हुआ कि आज की तारीख में समाचर से अधिक उसके शीर्षक का महत्व है। फिर चाहे उस शीर्षक के अंतर्गत आने वाले समाचार में दम हो न हो पर शीर्षक में दम अवश्य होनी चाहिए। ताकि वह पाठकों को उस विषय में सोचने के लिए विवश कर दे।

आज ऐसा ही कुछ मुझे भी महसूस हुआ जब मैंने एक और ग्रामीण बच्चों की शिक्षा के विषय में उन्हें ग्लोबल शिक्षा देने की बात पढ़ी। ग्लोबल शिक्षा बोले तो उन्हें (कमप्यूटर और नेट से संबंधित जानकारी देना) या उन्हें यह बताना कि इंटरनेट के माध्यम से भी शिक्षा कैसे ग्रहण की जा सकती, और अपने यहाँ (भारत) में तो शिक्षा प्राणाली का पहले ही बंटाधार है। ऊपर से यह नई पहल खैर   वही दूसरी और महिलाओं से संबन्धित एक अन्य आलेख के अंतर्गत मैंने यह पढ़ा कि समाज में महिलाओं के प्रति लोगों के नज़रिये को बदलने के लिए महिलाओं को अपनी पारंपरिक सोच बदलने की आवश्यकता है। इन दोनों ही विषयों ने मुझे बहुत कुछ सोचने पर विवश कर दिया कि जहां आज भी एक ओर ग्रामीण बच्चों की प्राथमिक शिक्षा तक का ठिकाना नहीं है, वहाँ उन बच्चों को ग्लोबल शिक्षा से अवगत कराना क्या सही होगा ?

लेकिन आगे कुछ भी कहने से पहले मैं यहाँ यह बताती चलूँ कि मैं बच्चों के विकास के विरुद्ध नहीं हूँ। किन्तु सोचने वाली बात है यह है कि जहां एक और गाँव में आज भी बहुत से लोग अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते वहाँ ग्लोबल शिक्षा की जानकारी देना। बात कुछ हजम नहीं होती।

ऐसा नहीं कि गाँव के बच्चों को नयी तकनीकों के माध्यम से आगे बढ़ने या पढ़ने लिखने का अधिकार नहीं है। है, बिलकुल है ! लेकिन जहां गाँव के शिक्षक ही पूर्णरूप से शिक्षित न हों, जो अपने गाँव के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा ही सही तरीके से दे पाने में असमर्थ हों। जहां गरीबी के चलते आज भी शिक्षा के प्रति उदासीनता का भाव हो। वहाँ ग्लोबल शिक्षा की बातें करना मेरी समझ से तो कोई समझदारी वाली बात नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं ग्रामीण बच्चों कि ग्लोबल शिक्षा के खिलाफ हूँ। लेकिन मेरा मानना यह है कि कोई भी नयी इमारत के निर्माण से पहले उसकी नीव का  मजबूत होना अधिक आवश्यक है। तभी आप उस पर एक मजबूत इमारत बनाने में सफल हो सकते हैं। पर कई इलाकों में तो जीवन जीने का ही आभाव है क्यूंकि किसानों की हालत और बढ़ती मंहगाई कि मार से जब कोई भी इंसान अछूता नहीं है तो फिर हमारे उन अन्न दाताओं की तो बात ही क्या।

ऐसे में जीवन यापन से जुड़ी जरूरतों के अभाव में जब प्राथमिक शिक्षा का ही अभाव होगा, जो स्वाभाविक भी है। वहाँ ग्लोबल शिक्षा की बातों को भला कौन समझेगा।

रही महिलाओं के विकास की बात जिसमें एक महिला के द्वारा यह कहा गया कि यदि हमें समाज में अपने प्रति लोगों का नज़रिया बदलना है तो उसके लिए सर्वप्रथम हम स्त्रियॉं को ही अपनी पारंपरिक सोच को बदलना होगा। कुछ हद तक यह बात सही है। लेकिन यदि हम हर वर्ग की महिलाओं की बात करें तो शायद यह एक नामुमकिन सी बात है। क्यूँ ? क्यूंकि हम उस देश में रहते हैं जहां बड़े से बड़े शहर में रहने वाला उच्च शिक्षा प्राप्त इंसान आज भी बेटे और बेटी की परवरिश में फर्क करता है। जहां या तो बेटी पैदा ही नहीं होने दी जाती या फिर उसके पैदा होते ही उसे पारंपरिक रूप से चली आरही दक़ियानूसी बातों को उसके मन में बैठाना शुरू कर दिया जाता है।

खैर यह एक अंत हीन विषय है और अभी यहाँ इस विषय को मद्दे नज़र रखते हुये मैं यहाँ इस बारे में ज्यादा कुछ कहना उचित नहीं समझती। लेकिन यह एक कड़वी सच्चाई है। ऐसे में भला कोई भी लड़की जिसके दिमाग में बचपन से ही गलत बातें भर दी गयी हों वो आगे जाकर अपनी पारंपरिक सोच को कैसे बदल सकती है। या फिर एक ऐसी लड़की जिसने सदा अपनी माँ पर अत्याचार होते देखा हो। उसके साथ दुर्व्यवहार होते देखा हो। वो लड़की विरासत में क्या पाएगी। फिर ऐसे में हम समग्र रूप से यह कैसे कह सकते हैं कि हमें अपनी पारंपरिक सोच को छोड़कर एक नए सिरे से नए समाज के निर्माण हेतु कुछ नया सोचना चाहिए।

चलिये एक बार को हम यह मान भी लें कि कुछ मुट्ठी भर लोग ऐसा करने मैं सफल हो भी गए, तो क्या होगा। मैं कहती हूँ कुछ नहीं होगा ! क्यूंकि हमारी जनसंख्या का एक बड़ा तबका या एक बड़ा भाग ऐसा है जो इन बातों को या तो समझना ही नहीं चाहता या फिर समझ ही नहीं सकता है। ऐसे हालातों में यह बात समाज का वो बड़ा हिस्सा कैसे समझेगा। यह बात मेरी समझ से तो बाहर है।

अरे जिसे जीने के लिए रोटी कपड़ा और मकान जैसी अहम जरूरत की पूर्ति नहीं हो पा रही है। उसके लिए तो यह बातें किसी प्रवचन से ज्यादा और कुछ भी नहीं है। जो महिला रोज़ काम से थक्कर चूर होने पर भी रोज़ अपने ही घर में, अपनों के द्वारा घरेलू हिंसा का शिकार होती है। वह महिला कैसे बदलेगी अपनी सोच और क्या सिखाएगी अपनी बेटी को, जहां आज भी अपने घर की बहू बेटियों को घर के अहम सदस्य की भांति बराबर का सम्मान नहीं मिलता। जहां एक औरत को आज भी केवल बेटा पैदा करने के लिए किसी बच्चे पैदा करने वाली मशीन की तरह इस्तेमाल किया जाता है। और बेटी पैदा करने पर प्रताड़ित किया जाता है। वह महिला भला अपनी सोच तो क्या अपना कुछ भी बदल सके तो बहुत है। सोच बदलना तो दूर की बात है।

मुझे तो ऐसा लगता है कि जब तक हमारा समाज एक पुरुष प्रधान समाज रहेगा तब तक कुछ नहीं हो सकता। क्यूंकि सोच बदलने की जरूरत महिलाओं से अधिक पुरुषों को है। जो सदैव अपने अहम में अहंकारी बनकर अपने ही घर की स्त्रियॉं पर जुल्म करते है। अगर कोई सोच बदलनी है तो सिर्फ इतनी कि एक बेटे की परवरिश करते वक्त हमें उसे यह सिखाना है कि बेटा एक लड़की भी एक इंसान है और तुम भी एक इंसान ही हो। यदि वह रो सकती है तो तुम भी रो सकते हो। रोने से कोई लड़का कभी लड़की नहीं बन जाता या कमजोर नहीं हो जाता। अपनी भावनाओं को छिपाने का नाम पुरषार्थ नहीं कहलाता। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार भावनाओं को दिखा देने से या जाता देने से कोई स्त्री कमजोर नहीं हो जाती। ठीक उसी प्रकार भावनाओं को छिपा लेने से कोई लड़का या कोई पुरुष मजबूत नहीं हो जाता। बल्कि कहीं न कहीं पुरुषों की यही बात उन्हें अंदर ही अंदर खोखला एवं कमजोर बना देती है। क्यूंकि यदि ऐसा न होता तो सभी देवताओं ने अपनी-अपनी शक्ति को मिलाकर एक स्त्री (जो नारी शक्ति का प्रतीक है) माँ दुर्गा का निर्माण नहीं किया होता। यदि वह चाहते तो अपनी शक्तियों को कोई और भी रूप दे सकते थे। किन्तु उन्होने ऐसा नहीं किया क्यूंकि वह जानते थे कि नारी में ही वह शक्ति है जो पुरुषों को संभाल सकती है।

बस केवल यही एक बात को समझाते हुए हमे अपने व्यवहार के माध्यम से अपने बच्चों के सामने कुछ ऐसे उदाहरण रखने की जरूरत है जिसे देखकर वह स्वयं ही इंसानियत का पाठ पढ़ जाये   क्यूंकि अच्छा या बुरा/सही या गलत बच्चे जो भी सीखते हैं, सर्वप्रथम अपने घर से ही सीखते है और वहीं से उनकी सोच का निर्माण शुरू होता है। इसलिए यदि पारंपरिक सोच बदलने की जरूरत किसी को है तो वो पुरुषों को अधिक है और स्त्रियॉं को कम। जिस दिन सामाज की यह सोच बदल गयी उसी दिन से स्त्रियों के प्रति समाज का नज़रिया अपने आप ही बदल जाएगा। जय हिन्द….

गो सोलो (GO SOLO)

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आजकल मोबाइल की इस एप्प का विज्ञापन टीवी पर बहुत दिखया जा रहा है। आपने भी ज़रूर देखा होगा। जहां इस एप्प ने आपको अपनी मन मर्जी के मुताबिक जब जी चाहे, जहां जी चाहे अपनी पसंद के कार्यक्रम देखने की सहूलियत दी वहीं दूसरी ओर कहीं न कहीं आपको अकेला कर दिया। यूं तो सयुंक्त परिवारों के टूटने से लेकर इंटरनेट के अंधाधुन उपयोग में आने के बाद से इंसान पहले ही स्वयं को अकेला महसूस करने लगा था। जिसके चलते उसने इंटरनेट पर बनी ऑर्कुट एवं फेस्बूक जैसी आभासी दुनिया की शरण लेना प्रारम्भ कर दिया और इस एप्प ने भी कहीं न कहीं इंसान के उस अकेलेपन में वृद्धि ही की है।

मैं जब भी इस विज्ञापन को देखती हूँ तो मेरे दिमाग में सदैव एक ही विचार आता है कि नित नयी तकनीकों के आ जाने से इंसान पहले ही बहुत अकेला होगया है। विशेष रूप से यह मोबाइल आ जाने के बाद तो जैसे इंसान का वास्तविक दुनिया से नाता ही टूट गया है और उसने अपने चारों ओर किसी किले की भांति एक आभासी दुनिया का निर्माण कर लिया। जिसमें कुछ भी सच्चाई नहीं है। बल्कि हर चीज़ केवल एक आभास है। फिर चाहे वह दोस्ती का पवित्र रिश्ता हो, या त्योहारों का मनाया जाना। कहने का तात्पर्य यह है कि जो चीज़ वास्तविक रूप से पायी जा सकती है उससे भी हमने अपने आपको अलग कर लिया।

मेरे विचार से एक ओर जहां माता-पिता दोनों के रोजगार करने में तो बच्चों का बचपन पहले ही अकेला हो गया था। फिर जब बड़े हुए तो उच्च शिक्षा प्राप्त करने की चाह ने परिवार से दूर कर दिया। वह अकेलापन पहले ही कम नहीं था। उस पर “हॉट स्टार की नयी एप्प गो सोलो” जैसी और भी कई एप्प ने मन के उस सुनेपन को और भी बढ़ावा दिया है।

मानते हैं कि इस आभासी दुनिया ने जहां एक और बहुत से अकेले लोगों को सहारा दिया हालांकी यह भी महज़ एक आभास के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता, तो वहीं दूसरी और इस आभासी दुनिया ने बहुत से लोगों को अपने-अपने जीवन में बहुत अकेला और असुरक्षित भी कर दिया। लोग अपनी वास्तविक दुनिया से ज्यादा समय अपनी इस आभासी दुनिया को देने लग गए। और दिनों दिन अकेले होते चले गए। मेरी समझ से तो यदि यह दुनिया केवल एक दूसरे के कुशल मंगल जाने के समाचार तक ही सीमित होती तो शायद फिर भी हम इस अवसाद के शिकार न हुए होते। मगर अफसोस की इस आभासी दुनिया का विस्तार इतनी तेज़ी से हमारे जीवन में फैला, जितनी तेज़ी से हमारे बदन में रक्त फैलता है। और हम कब इस आभासी दुनिए के अकेले पन का शिकार होते चले गए यह हमें स्वयं ही पता नहीं चला। एक समय में यह दुनिया जब तक कंमप्यूटर तक सीमित थी तब तक भी थोड़ा बहुत ठीक था। मगर अब जब यह दुनिया मोबाइल के माध्यम से हाथों में आगयी है। तब से तो बस ‘जल ही जीवन है’ का नारा ‘मोबाइल ही जीवन’ है में तब्दील होगया है।

मुझे तो यह ही समझ नहीं आता कि हम क्यूँ सभी प्राकर्तिक चीजों को छोड़कर नकली चीजों की ओर भागे जा रहे है। क्यूंकि आज वर्तमान में हमारे जीवन का शायद ही कोई भाग ऐसा हो जिसे हम आज भी पूर्ण रूप से जैसा है वैसा ही अपना कर उसे वैसा ही जी रहे हो जैसा हमें कुदरत ने या हमारी संस्कृति ने हमे दिया था। फिर चाहे वो हमारा पहनावा हो या खानपान, गीत संगीत सुनने की चाह हो, या पढ़ने लिखने का ढंग। सभी पर तो विदेशी चीजों का ही वर्चस्व छाया है। हर कोई विदेशी नकल करने में लगा है। इस सब में इंसान की अपनी पसंद और उसकी अपनी रुचि कहीं दब कर गुम हो गयी है।

मैं मानती हूँ परिवर्तन ही जीवन है। किन्तु ऐसा परिवर्तन भी भला किस काम का जो आपको आपकी ही वास्तविकता से दूर कर दे। एक वह समय था जब इंसान कभी अकेले रहने की कल्पना तक नहीं कर सकता था। और एक आज का समय है कि इंसान हर वक्त केवल अकेले रहने के बहाने ढूँढता रहता है। और यही काम कर रही है ‘मोबाइल कि यह एप्प गो सोलो’ मतलब टीवी देखने जैसे साधारण से काम के लिए भी आप अपने परिवार वालों के साथ समझौता मत करो बड़े –बड़े कामों के लिए समझौते करना तो दूर की बातें हैं।

जो करना है अकेले करो क्यूँ ? क्यूंकि किसी को भी अपनी ज़िंदगी में किसी और की दखलंदाजी बरदाश्त नहीं होती। इंसान की ज़िंदगी से गाँव क्या छूटे शहर भी हाथों से छूटता चला गया और अब तो शहर ही नहीं देश भी छूट गया। जिस से न सिर्फ वो दूर जाने वाला बल्कि उसके परिवार वाले भी अकेले रह गए। कभी कभी तो लगता है कि मोबाइल फोन का निर्माण करने वाला व्यक्ति ही अपनी निजी ज़िंदगी में शायद अकेलेपन जाइए अवसाद का शिकार रहा होगा जिसे दूर करने के लिए उसने यह खिलौना बनाया जो आज की तारीख में इंसान की ज़िंदगी से ज्यादा महंगा और अहम हो गया। एक ज़माना था जब हमें दोस्तों के साथ समय बिताने के लिए कुछ भी कर गुजरते थे और एक आज का समय है कि न सिर्फ हम बल्कि छोटे-छोटे बचे भी अपने ही दोस्तों से यह कहते हैं कि हमारी पसंद नहीं मिलती दोस्त, तू जा अपने रास्ते और मुझे अपने रास्ते जाने दे।

एक समय था जब हम टीवी देखने को तरसते थे फिर चाहे उस पर जो कुछ आ रहा हो हम सब झेल जाते थे। मगर आज हमें टीवी देखना तो दूर उस बहाने अपने परिवार के सदस्यों के साथ बैठकर समय बिताना तक गवारा नहीं क्यूंकि हममें अब समझोता या शायद संयम की काबिलियत ही नहीं। अब फिल्मों को ही ले लीजिये। टीवी पर फिल्में पहले भी आती थी और आज भी आती है। मगर पहले उन्हें टीवी पर सबके साथ बैठकर देखने का एक अलग ही चाव हुआ करता था। जिसके चलते सभी अपना-अपना काम समय पर ही खत्म कर लिया करते थे। मगर आज मोबाइल की इस एप्प ने हमसे हमारा वो चाव भी छीन लिया और बदले में दे दी एक सुनसान वीरान आभासों से भरी अकेली खाली दुनिया। आज कितना बदला गया है ना सब कुछ ! अब घरों में खाने की टेबल पर रोज़ की चर्चा नहीं होती। अब न माता-पिता को अपनी ज़िंदगी में अपने बच्चों का दखल पसंद है और ना ही बच्चों को अपनी ज़िंदगी में बड़ों का, सभी बस एक ही बात सोचते हैं और एक ही बात कहते है ‘गो सोलो’ कभी गुरुदेव ने भी अपने एक गीत में लिखा था “एकला चोलो रे” मगर आज मोबाइल की इस एप्प ने उसे कोई और ही अर्थ देकर न जाने क्या से क्या बना दिय। दिशा चाहे सही हो या गलत सब उस राह पर अकेले ही चलना चाहते हैं। हम इस दुनिया में अकेले ही आए थे और हमें अकेले ही जाना है। फिर भी न जाने क्यूँ हर किसी को यह जीवन अकेले ही बिताना है।

दोस्तों दुनिया चाहे जितनी आगे बढ़ जाये मगर इंसान की जरूरते न कभी बदली थी, न कभी बदलेंगी। उसे कल भी अपने परिवार की, नाते रिश्तेदारों की और उसे भी ज्यादा सच्चे दोस्तों की जरूरत कल भी थी, आज भी है और आगे भी रहेगी लेकिन यदि वह इसी तरह नित नयी आती तकनीकों का गुलाम होकर इस सब से दूर हो भी गया ना तो कभी खुश नहीं रह पाएगा, ज़िंदा तो रहेगा मगर कभी जी नहीं पाएगा। इसलिए दुनिया कुछ भी कहे मगर मैं कहती हूँ ‘डोंट गो सोलो’ सदा सबके साथ चलो सबको साथ लेकर चलो ताकि इस दुनिया में कोई भी इंसान खुद को कभी अकेला न महसूस कर सके। जय हिन्द …

तनाव मुक्त हो बच्चों का बचपन

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तनाव मुक्त हो बच्चों का बचपन यह पंक्ति देखने सुनने और पढ़ने में जितनी सुंदर और सार्थक प्रतीत होती है ना, वास्तव में उतनी ही जटिल है। क्यूंकि चाहते और सोचते तो हम सब भी यही हैं कि हमारे बच्चों का बचपन पूरी तरह से तनाव मुक्त रहे। वह अपने जीवन के इस बालकाल में एक ऐसी सुनहरी ज़िंदगी जी लें, जो आगे जाकर जीवन की कठिनाइयों का सामना करते वक्त भी उनके होठों पर एक प्यार भरी मुस्कान बिखेर देने में समर्थ हो। जो उन्हें कुछ ऐसे पल दे जो उनके मानस पटल पर कुछ इस तरह अंकित हो जाये कि जिसे अपने बच्चों को सुनाते वक्त उन्हें अपने आप पर गर्व महसूस हो।

यूं तो सुखद बचपन की कोई परिभाषा नहीं होती। मगर फिर भी जहां निजी जरूरत की पूर्ति के साथ-साथ बड़ों के आशीर्वाद हो, उनका प्यार दुलार डांट डपट सभी कुछ मौजूद हो, जीवन के वो हँसते गाते पल हों जो जीवन शब्द को सार्थक बनाते हैं। वही तो सही मायने में बचपन कहलाता है। हम सब भी तो अपने बच्चों को एक ऐसा ही बचपन देना चाहते है। जहां एक सव्छद वातावरण हो पंख फैलाने के लिए। मगर हर एक बच्चे के नसीब में नहीं होते यह सुखद एहसास। क्यूंकि यह सिर्फ किताबी बातें हैं। वास्तविकता तो ठीक इसके विपरीत है।

आज बच्चों के लिए ऐसी कल्पना करना भी एक सपने जैसा है। क्यूंकि आज के बच्चे बचपन से ही तनाव जैसे भयानक रोग का शिकार है। और यह तनाव केवल पढ़ाई लिखाई या शिक्षा तक ही सीमित नहीं है। बल्कि इसके पीछे बहुत से ऐसे कारण है जिन्हें सोचकर भी आश्चर्य होता है कि बच्चे भी इस विषय को लेकर इतनी गंभीरता से सोच सकते हैं। किन्तु फिर भी बच्चों पर उन बातों का एक ख़ासी असर देखा जा सकता है। इसके लिए भी शायद जिम्मेदार केवल हम ही हैं। जो अपनी इस तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में केवल पैसा कमाने और बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवाने के विचार में ही सिमटकर रह गए हैं। जिसके चलते पैसे और शिक्षा के अलावा भी ज़िंदगी में बहुत कुछ है करने को, सीखने को और उन्हें सीखने को भी मगर अपनी रोज़ मररा की ज़िंदगी में उन छोटी-छोटी बातो पर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। पर बच्चे उन बातों को बहुत ध्यान से सुनते हैं। और कहीं न कहीं वह बातें उनके कोमल मन में हमेशा के लिए घर कर जाती है।

पिछले कुछ दिनों में ऐसा ही एक अनुभव मुझे भी हुआ। अपने पिता की कंपनी को लेकर अपने सहपाठियों में अपनी जगह या स्थान का अंतर उनके मासूम मन पर भारी प्रभाव डालता है। मसलन यदि किसी बच्चे/बच्ची के पापा किसी बड़ी या नमी ग्रॅमी कंपनी में काम नहीं करते है तो ठीक, पर यदि किसी छोटी-मोटी कंपनी में काम करते हैं तो बच्चा अपने सहपाठियों एवं मित्रों के बीच अपने आपको दीन हीन महसूस करता है। है न आश्चर्य की बात ! कम से कम मुझे तो यही लगता था कि इन सब बातों से बच्चों को क्या फर्क पड़ता है। मगर मैं गलत थी। उन्हें भी हम बड़ों की तरह इस सब से बहुत फर्क पड़ता है।

यूं भी देखा जाए तो सर्वप्रथम शिक्षा का दुशाला ओढ़े परीक्षा परिणामों के अंकों में सिमटी कर रह गयी है आज उनकी ज़िंदगी। उससे ही उबर नहीं पाये बच्चे और दूसरी ओर यौन शोषण से लेकर बाल मजदूरी और घरेलू हिंसा जैसे अपराधों का शिकार बन गया है उनका बचपन। ऐसे में तनाव नहीं होगा तो और क्या होगा। जिन छोटे-छोटे नन्हें-नन्हें हाथों में किताबों और खिलौने शोभा देनी चाहिए, उन नन्हें कंधों पर आज परिवार का बोझ दिखाई देता है। जहां आँखों में शिक्षा की चमक होनी चाहिए। आज वहाँ उन आँखों में रोटी की ललक दिखाई देती है। यह सब देखकर बुरा भी बहुत लगता है मगर हो कुछ नहीं सकता। क्यूंकि ऐसा जीवन जीते-जीते उन्हें भी ऐसे ही जीवन की आदत पड़ चुकी होती है। या एक तरह से ऐसा भी कहा जा सकता है कि कमाई थोड़ी ही होती है, मगर इन्हें कमाई की आदत पड़ चुकी होती है। इसलिए इनका पढ़ने का दिल नहीं करता और जिनका दिल करता भी है उनके माता-पिता उन्हें आय के चक्कर में इस भंवर से उबरने नहीं देते और इसी तरह ज़िंदगी जीते-जीते एक दिन यह बच्चे अवसाद का शिकार हो जाते है। और वक्त के हाथों मजबूर होकर अपराध करने पर उतर आते है।

बच्चों के तनाव का अंतिम और सबसे बड़ा कारण तो हमारी शिक्षाप्रणाली है ही। माना कि प्रतिस्पर्धा का ज़माना है। आगे बढ़ना है, तो मेहनत तो करनी ही पड़ेगी। लेकिन इसका अर्थ मानसिक तनाव का लगातार बने रहना तो नहीं होना चाहिए न ! मगर हो यही रहा है। पूछिये क्यूँ ? क्यूंकि आजकल की शिक्षा हमारे बच्चों को केवल शिक्षित बना रही है सभ्य नहीं।

जबकि वास्तव में होना यह चाहिए कि शिक्षा बच्चों को भले ही एक बार को शिक्षित बनाए न बनाए। मगर सभ्य तो बनाए। पर ऐसा है नहीं। आप सभी को शायद याद हो जब हम बच्चे थे तब हमारे जमाने में अन्य विषयों के साथ-साथ एक नैतिक शिक्षा (मॉरल साइन्स) नाम का विषय भी हुआ करता था। जिसके अंतर्गत हमें यह सिखाया जाता था कि समाज में हमे कब कहाँ किससे कैसा व्यवहार करना चाहिए। तब विषय कम थे मगर अच्छे थे। आज तो ऐसा लगता है जैसे विषयों की बाढ़ आयी हुई है और ज्ञान लोप हो गया है। बच्चे भी केवल अंक हासिल करने के लिय पढ़ते हैं। उस विषय को जानने और समझने के लिए नहीं। ऐसा नहीं है कि यह बात सभी बच्चों पर लागू होती है। मगर यह वो बात है जो बच्चों के जीवन में तानव का एक अहम कारण बन गयी है।

कभी-कभी तो समझ ही नहीं आता कि क्यूँ हम अपने बच्चों का दिमाग महज़ अक्षरज्ञान से भर रहे है। जबकि उसकी समझ में कुछ नहीं आरहा है और ना ही वो इस तरह कि शिक्षा से कुछ सीख ही पा रहा है। लेकिन हम बस गधे घोड़े की तरह उसके सामने विषय रूपी घास डाले जा रहे है और उस बेचारे को तो इस बात का भी भान नहीं है कि उसका दिमाग रूपी पेट भरा भी है या नहीं। वो भी बस बिना कुछ सोचे-समझे बस उस विषय रूपी घास को खाये जा रहा है। भला ऐसी शिक्षा का भी क्या फायदा ! क्या आपको नहीं लगता ऐसी ही छोटी-बड़ी कमियों ने मिलकर बच्चों को इतना तनावग्रस्त कर दिया है कि वो अपनी सोचने समझने कि शक्ति ही खो बैठे हैं।

इसी सब का नतीजा है वक्त से पहले बड़े होते बच्चे जो राह भटककर बलात्कार, तेजाबी हमले, चोरी आदि जैसे बड़े अपराधों को बढ़ावा दे रहे हैं। क्यूंकि ज़िंदगी के तनाव ने उनकी सोचने समझने वाली वो ग्रंथी जो उन्हें सही और गलत में अंतर दर्शा सके को पूर्ण रूप से सुन्न कर दिया है। जिसके चलते ज़िंदगी की सबसे बड़ी कमी उन्हें केवल पैसा ही दिखाई देता है। और जब उसकी पूर्ति सही तरीके से नहीं हो पाती तो यही बच्चे गलत रास्ते पर चले जाते है। इसलिए ही तो कम उम्र में आपराधिक प्रवर्ती का आसानी से शिकार बन जाते है यह बच्चे, बाकी जो ऐसा नहीं कर पाते वो आत्महत्या जैसे जघन्य अपराध का सहारा ले लेते हैं। कहीं न कहीं शायद इसके जिम्मेदार भी हम ही हैं। क्यूंकि सामाजिक स्तर पर खुद को श्रेष्ठ दिखने कि अभिभावकों की लालसा ने बच्चों से उनका मासूम बचपन ही छीन लिया है।

इसलिए यदि हमें शीर्षक की इस पंक्ति को सार्थक करना है कि ”तनाव मुक्त हो बच्चों का बचपन” तो उसकी शुरुआत सर्वप्रथम हमे अपनी ही सोच को बदलकर करना होगा। सबसे पहले हमें स्वयं ज़मीन पर आना होगा और विदेशों की नकल कर रहे अनतर्राष्ट्रीय विद्यालयों से अपने बच्चों को निकालकर किसी साधारण विद्यालय में भेजना होगा और कोशिश करनी होगी कि हमारे यहाँ भी सरकारी स्कूल का स्तर इतना ऊपर उठ सके कि हमें अपने बच्चों को वहाँ भेजने में शर्म नहीं बल्कि गर्व महसूस हो। क्यूंकि जबतक हम दिखावे से ऊपर उठकर अपने बच्चों का मन नहीं पढ़ सकेंगे। तब तक इस जैसी सभी बातों का प्रभाव उनके कोमल मन पर पढ़ता रहेगा और अपना दुश प्रभाव छोड़ता रहेगा।

 

 

 

 

 

 

ज़िंदगी…

life-stages-digital-art-hd-wallpaper-1920x1200-10314ज़िंदगी

ज़िंदगी एक बहुत बड़ी नियामत है जिसका कोई आकार-प्रकार, कोई आदि कोई अंत नहीं है। जहां एक और एक ज़िंदगी खत्म हो रही होती है। वहीं दूसरी और न जाने कितनी नयी ज़िंदगियाँ जन्म ले रही होती है। क्यूंकि ज़िंदगी तो आखिर ज़िंदगी ही होती है। फिर चाहे वो मानव की हो या किसी अन्य जीव जन्तु की, होती तो ज़िंदगी ही है। यह वो शब्द है, जो ‘ईश्वर की तरह’ है। अर्थात जो जिस रूप में इसे देखता है, या जो जैसा इस विषय में सोचता है। यह उसे वैसी ही नज़र आती है। किसी के लिए पहाड़ तो किसी के लिए शुरू हो से पहले ही खत्म हो जाने वाली एक छोटी सी डगर। अमीर घर में पैदा हुए किसी बच्‍चे के लिए ज़िंदगी कुदरत का अनमोल तोहफा होती है, तो बहुत ज्‍यादा गरीबी में ज़िंदगी कुदरत का अभिशाप भी बन जाती है।

मगर न जाने क्यूँ…पिछले कुछ वर्षों में तेज़ी से बढ़ते हुए आतंकवाद और हादसों को लेकर आज मन बहुत उदास है। अभी हम कश्मीर में हुई तबाही से उबर भी नहीं पाये थे कि आसाम में भी इतने लोग मारे गए। मगर कहीं कोई दुख की लहर दिखाई नहीं दी, न आम जनता के चेहरे पर न वहाँ के प्रशासन पर, तभी तो जितना अफसोस पेशावर कांड के लिए दिखाया गया उसके मुक़ाबले तो शायद एक प्रतिशत भी आसाम या कश्मीर में मारे गए लोगों के लिए नहीं दिखया गया था।

एसा शायद इसलिए हुआ क्यूंकि वक्त तो किसी के लिए नहीं रुकता। कोई आए कोई जाये उसे तो कोई फर्क ही नहीं पड़ता। ज़िंदगी का दूसरा नाम वक्त ही तो है। वो भी तो किसी के लिए नहीं रुकती। एक ओर लोग मर रहे हैं। तो वहाँ दूसरी ओर लोग शादी ब्याह में अपना रुतबा दिखाने के लिए पैसा पानी की तरह बहा-बहाकर जश्न माना रहे है। दान धर्म तो जैसे भूली बिरसी बात हो गयी। फिर भी यदि कोई करता भी है तो मिडीया में आने क लिए। कहते हैं उम्मीद पर दुनिया कायम है। इसलिए चाहे वक्त कितना भी बुरा क्यूँ न चल रहा हो, इंसान को उम्मीद का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए। क्यूंकि हर रात चाहे कितने भी गहरी, कितनी भी लंबी क्यूँ ना हो! किन्तु हर रात की सुबह ज़रूर होती है। सुनने और पढ़ने में तो यह बातें बहुत अच्छी लगती हैं। मगर कोई जाकर उनसे पूछे जो इस रात से गुज़र रहे हैं। उनके हालात देखकर तो मेरे अंदर की सारी उम्मीदें अब खत्म हो चुकी हैं। अब कोई फरिश्ता भी आकर सब कुछ ठीक कर दे तो बहुत अच्छा नहीं करे तो भी अब तो जैसे आदत हो चली है यह सब देखने सुनने की अब कोई फर्क ही नहीं पड़ता। शायद उसके आने में भी अब देर हो चुकी है।

कितनी आजीब है न यह ज़िंदगी ! कोई इसे पाकर फुला नहीं समाता, तो कोई इसे खोकर ही चैन पाता है। इतनी जटिल होने के बावजूद भी हरदिल अज़ीज़ होती है यह ज़िंदगी। फिर भी अब न जाने क्यूँ जब कभी किसी मासूम की ज़िंदगी छिन जाने की कोई खबर सामने आती है, तो चाहे अनचाहे दिल से एक आह ! निकल ही जाती है। ‘फिर भी यदि मैं यह कहूँ’ कि अब कोई दर्द नहीं होता इस सीने में, न अब कभी कोई कतरा ही आता है इन आँखों में किसी के घर का बुझता हुआ चिराग देख-सुन या पढ़कर। अब तो जैसे रोज़ सांस लेने जैसा आम होगया है यह मंज़र। मर गयी है अब सारी समवेदनाएं मेरे अंदर की, अब न इन आँखों में कोई गुस्सा है, न होंठों पर कोई गाली, अब नहीं उतरता कोई खून इन आँखों में आतंकवाद को लेकर। क्यूंकि अब तो यह लगभग हर एक घर का किस्सा है। मर रहे हैं इंसान चारों तरफ, क्या फर्क पड़ता है कि यह घर तेरा है या मेरा है! अब तो लगता है कुदरता का रंग भी अब आँखों में लहू बनकर ही उतर आया है कि अब कहीं कोई हरियाली कोई शीतलता दिखाई ही नहीं देती। अब चमन में भी कहाँ फूल महकते है। अब तो बस बारूद की ही गंध सूंघने को कुछ दिल तरसते है।

अब तो लगता है कुदरत ने भी अपना रंग बदल लिया है शायद क्यूंकि अब नहीं गिरते झरने पहाड़ों से, अब तो बसें गिरती है विद्यार्थियों से भरी आए दिन। अब बच्चे बीमार पड़ने पर गोलीयाँ नहीं खाते, बल्कि स्कूल जाने पर खाते है। हाँ यह बात अलग है कि कभी कोई सरफ़िर आ घुस्ता है (अमरीका) के किसी स्कूल में, तो कहीं जिहाद के नाम पर (पाकिस्तान) में बली चढ़ा दी जाती है। तो कहीं मिड डे मील (हिंदुस्तान) के नाम पर उन्हें जहर खिला दिया जाता है। अकाहीर कब तक यूं ही चढ़ाई जाती रहेंगी बलियाँ उन मासूमों की जो यह जानते तक नहीं की उनकी गलती क्या है। बच्चों के लिए तो अब जैसे कोई स्थान सुरक्षित ही नहीं रह गया है। पहले ही कन्या भूर्ण हत्या से लेकर बाल उत्पीड़न जैसे अपराध कम नहीं थे और अब जिहाद के नाम पर यह आतंकवाद।

लेकिन अब अफसोस नहीं होता मुझे क्यूंकि “जो जैसा बोता है वो वैसा ही काटता भी है” पाकिस्तान ने जो बोया वही उसने स्वयं पेशवार में हुए हत्याकांड में पाया। दूसरों के घरों को जलाकर जश्न मनाने वालों के घर में भी आज उसी आग का कहर बरपा है। क्या पहले कभी हिंदुस्तान में नहीं हुआ ऐसा ? जो आज पाकिस्तान का दर्द देख, हर हिन्दुस्तानी दिल दर्द से तड़पा है। पाकिस्तान से तो कभी ऐसी कोई हवा तक नहीं आई, फिर क्यूँ यह मंज़र देख हिंदुस्तान तर्राया है। सब से पहले तो एक औरत और एक माँ होने के नाते बहुत अच्छे से समझ सकती हूँ मैं उन माँओं के दिल का वो दर्द जिन्होंने एक आम नागरिक होने के नाते सियासत के इस खेल में अपना सब कुछ गवाया है। लेकिन न जाने क्यूँ अब यह खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि अब एक इंसान होने के बावजूद भी दिल से दर्द का रिश्ता ख़त्म हो गया सा लगता है।

जैसे अब कोई इंसानी रूह नहीं बची है मेरे अंदर, बल्कि यह जिस्म जैसे कोई बेजान बुत बन गया है। जिसके चेहरे पर अब कोई भाव नहीं आते। जिसकी आंखे में अब कोई ख़्वाब नहीं आते। अब तो पथरा चुकी है यह आँखें भी उस दिन के इंतज़ार में जब कोई ऐसा आएगा जो अमन का पैगाम लाएगा। जो इस धरती को फिर से हरा और आसमान को नीला कर जाएगा। जिसके आने से महकने लगेंगे फिर फूल और एक बार फिर बच्चा-बच्चा मुस्कुराएगा। जिसके आने से इंसान फिर इंसान कहलाएगा। पता नहीं ऐसा कोई कभी आयेगा भी या नहीं।

मगर वर्तमान हालातों को मद्दे नज़र रखते हुए तो ऐसा लगता है कि इंसान को इंसानियत पर यह एहसान करना होगा कि वह नए बच्चे को जन्म देना ही बंद करदे या फिर हे मेरे ईश्वर तू यह दुनिया को ही ख़त्म कर दे।

 

 

 

अजीब दास्तां है यह!

सच ही तो हैं इस गीत की यह पंक्तियाँ कि…अजीब दास्तां है यह, कहाँ शुरू खत्म यह मंजिल हैं कौन सी न वो समझ सके न हम….

यह ज़िंदगी भी तो एक ऐसी ही दास्तां हैं। एक पहेली जो हर पल नए नए रंग दिखती है। जिसे समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा लगता है। कब कहाँ किस मोड पर ज़िंदगी का आपको कौन सा रंग देखने को मिलेगा यह अपने आप में एक पहेली ही तो है। इसका एक उदाहरण अभी कुछ दिनों पहले दीपावली के अवसर पर ही मैंने स्वयं अपने घर के पीछे ही देखा और तब से मेरे मन में रह रहकर यह विचार उठ रहा है कि चाहे ज़माना कितना भी क्यूँ न बदल जाये। चाहे दुनिया के सारे रिश्ते बदल जाएँ। मगर माता-पिता का अपने बच्चों से रिश्ता न कभी बदला था, न बदला है और ना ही कभी बदलेगा। इस बार जब मुझे इतने वर्षों बाद अपने सम्पूर्ण परिवार के साथ दीपोत्सव मनाने का मौका मिला तो मन बहुत खुश था। लेकिन साथ ही एक ओर आसमान छूती महँगाई कहीं न कहीं मन को झँझोड़ रही थी कि क्या फायदा ऐसे उत्सव मनाने का जहां आपके ही घर के नीचे रह रहे मजदूरों के घर एक दिया भी बामुश्किल जल पा रहा हो।

विशेष रूप से पटाखे खरीदते वक्त यह विचार आया कि कहाँ तो हम आप जैसे लोग हजारों रुपये पटाखों के रूप में यूं ही जला देंगे और कहाँ उन घर के मासूम बच्चों को शायद एक फुलझड़ी भी नसीब न हो। ऐसे मैं मुझे मेरे भोपाल की एक रीत बहुत याद आती है। जिसमें हर दिपावली पर पटाखे जलाने से पूर्व और लक्ष्मी पूजन के बाद सभी आस-पास के लोग एक दूसरे के घर जलते हुए दिये लेकर जाते हैं और अपने से पहले पड़ोसी के घर से रोशनी की शुरुआत करते हैं। आज भी यह परंपरा वहाँ कायम है या नहीं मैं कह नहीं सकती।

मगर मुझे वो रीत बेहद पसंद थी और आज भी है। किन्तु इतने सालों बाद यहाँ लौटने पर जो मुझे एक अपार निराशा हुई वह यह थी कि अब यहाँ आमने सामने भी कौन रहता है यह तक पता नहीं। कभी यदि भूल से सामने पड़ गए तो नमस्कार, चमत्कार जैसा ही महसूस होता है। फिर भला ऐसे माहौल मैं कौन किसके घर दिया रखने जाएगा। ऐसे मैं तो लोग यदि एक दूसरे को देखकर दिपोत्सव की शुभकामनायें भी दे दें तो बहुत है।

खैर मैं बात कर रही थी कि दुनिया का कोई भी रिश्ता बदल जाये मगर माता पिता का अपने बच्चों से रिश्ता कभी नहीं बदल सकता। मैंने देखा दिवाली के बहुत दिनों बाद एक दिन अचानक तड़के सुबह-सुबह बहुत तेज़ी से पटाखे चलने की आवाज आ रही है वो भी वो (लड़) वाले पटाखे जिनकी आवाज से अचानक ही नींद टूट गयी और ज़्यादातर लोग हड्बड़ा कर उठे होंगे इसका मुझे यकीन हैं। उनींदी आँखों से जब घर की बालकनी में जाकर देखा तो जो देखा उसे देखकर चेहरे पर एक मोहक सी मुस्कान बिखर गयी। मैंने देखा हमारे ही इमारत के नीचे रहने वाले कुछ मजदूर भाइयों ने अपने छोटे छोटे मासूम बच्चों के लिए अपने घर से एक छोटा सा टीन की छत का एक टुकड़ा जमीन पर बिछा दिया है और वहाँ मौजूद कुछ 10-12 बच्चे उस पर तेज़ी से एक साथ उछल रहे हैं। जिसके कारण पटाखों की सी आवाज़ आरही है और सभी बच्चे उस आती हुई तेज़ आवाज़ से इतने खुश हैं कि शायद असली पटाखे बजाते वक्त हम आप भी इतना खुश नहीं होते होंगे, जितना वह खुश थे।

आखिर गरीब माता-पिता ने भी अपने बच्चों की खुशियों का रास्ता ढूंढ ही लिया। उनके इस जज़्बे को मेरा सलाम और दुनिया के हर माता-पिता को मेरा प्रणाम….जय हिन्द                             

यह कैसा बाल दिवस !

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कितना कुछ है मन के अंदर इस विषय पर कहने को, किसी से अपनी मन की बात कहने को किन्तु हर किसी को नहीं बल्कि किसी ऐसे इंसान को जो वास्तव में इंसान कहलाने लायक हो। जिसके अन्तर्मन में अंश मात्र ही सही मगर इंसानियत अब भी कायम हो। वर्तमान हालातों को देखते हुए तो ऐसा ही लगता है कि बहुत मुश्किल है ऐसे किसी इंसान का मिलना। लेकिन ऐसा नहीं है कि दुनिया में सभी बुरे हैं। अच्छे इंसानों से भी दुनिया भरी पड़ी है। लेकिन समाचार पत्रों में जो देखा पढ़ा और जो रोज़ ही सुनते है उससे तो ऐसा ही लगता है कि शायद इस दुनिया में अच्छे लोग दिन प्रतिदिन घटते ही जा रहे हैं। क्यूंकि आज की तारीख में अच्छा बनने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ते है। यूं ही किसी को (नोबल प्राइज़) नहीं मिल जाता। वरना आज हर कोई (कैलाश सत्यार्थी) ही होता। बाल मजदूरों के लिए उन्होंने जो किया वो वाक़ई कबीले तारीफ़ है। वरना गलियों में पलने-बढ़ने वाला बचपन क्या जाने बाल दिवस किस चिड़िया का नाम है।

मुझे तो कई बार लगता है कि कहीं न कहीं इस सब के जिम्मेदार हम ही हैं। हमने ही मक्कारी और भ्रष्टाचार कर-करके अपने चारों तरफ एक ऐसा दूषित माहौल बना दिया है जिसमें न हम खुद खुल कर सांस ले पा रहें हैं और ना ही अपने बच्चों को खुला छोड़ पा रहे हैं ताकि वह स्वयं उड़कर अपने हिस्से के आसमाँ से अपनी साँसे मांग सकें। विशेष रूप से लड़कियाँ, यूं तो कहने को हर साल बाल दिवस बड़े धूम धाम से मनाया जाता है। मगर बाल शब्द से बना बालक/बालिका जैसे शब्दों के मायनों से क्या हम वाकई परिचित हैं ? शायद नहीं ! क्यूंकि हम कुछ भी कहें और कर लें मगर आस-पास घट रही घटनाओं का असर जितना हम पर होता है उसे कहीं ज्यादा बाल मन पर होता है। महिला उत्पीड़न का शिकार महिलाएं/घरेलू हिंसा /मारपीट / तो कहीं देह व्यापार कहीं बलात्कार तो कहीं तेजाबी हमला/और जब कुछ न बचा तो नन्ही सी जान का यौन उत्पीड़न फिर चाहे वो बालक हो या बालिका इन सब में से बाल शब्द तो लुप्त हो ही गया। फिर कैसा बाल दिवस? खुद ही सोचकर देखिये डरे सहमें से बच्चे क्या एक दिन का बाल दिवस मनाने से निडर हो जाएंगे ?

इसी तरह चाणक्य की तरह ज्ञान देने वाले लोग परवरिश पर ज्ञान देते हुए कहते हैं कि बच्चों को आठ वर्ष की आयु तक उनका बचपन जीने देना चाहिए और नवें वर्ष से अनुशासन सीखना प्रारम्भ कर देना चाहिए। जैसे अनुशासन कोई घुट्टी है कि पानी में घोल कर पिला दो और बस समझो काम हो गया। मगर मुझे परेशानी इस बात से भी नहीं है। मुझे परेशानी इस बात से है कि यह अनुशासन केवल बालिकाओं के लिए ही क्यूँ ? बालकों के लिए क्यूँ नहीं ? कच्ची उम्र में शादी कर बच्चे पैदा करना /अपने से पहले अपने भाई के लिए सोचना /खुद भूखी रहकर भी उसके लिए भीख मांगकर रोटी का इंतजाम करना/ परिवार चलाने के लिए बाल मजदूरी करता अबोध बचपन। जिन कंधों पर स्कूल का बस्ता शोभा देना चाहिए वहाँ उन नन्हें से कंधों पर सम्पूर्ण परिवार की ज़िम्मेदारी उठाता बचपन। भूख-प्यास गरीबी जैसे बड़े दानवों से रोज़ लड़ता हुआ बचपन। दिन रात गालियां और फटकार को सुन-सुनकर बड़ा होता बच्चा, भला क्या जाने बाल दिवस किस चिड़िया का नाम है। इतना ही नहीं जिसे न अपने माता-पिता का पता हो न खुद अपने जन्म की तारीख। वो क्या जाने कौन थे चाचा नेहरू और क्यूँ मनाया जाता है बाल दिवस। अरे जिसने कभी प्यार के दो मीठे बोल तक न सुने हो जिसे बालमन, बचपन, बच्चा जैसे शब्दों का बोध तक न हो वो क्या जाने बाल दिवस क्या होता है।

 ऐसे में हम उम्मीद भी कैसे कर सकते है अपने बच्चे के साथ यह दिवस मनाने की, इतना सब काफी नहीं है क्या सीखने के लिए ? मगर फिर भी हम आप जैसे सभ्य कहे जाने वाले (सो कॉल्ड मिडिल क्लास लोग) क्या करते हैं अपने बच्चों के लिए ? क्या कभी गौर किया है आपने ? नहीं ! तो ज़रा करके देखिये। मेटेरनिटी लीव से पक चुकी माँ बच्चे के पैदा होने के बाद बड़ी मुश्किल से घर में रहकर अपने दिन काटती है। क्यूंकि नौकरी भी ज़रूरी है। भई इतनी पढ़ाई लिखाई इसलिए थोड़ी न की थी कि घर में बैठकर बच्चे पाले। पैसा है ही तो आया रख लेंगे या फिर बच्चे के नाना नानी /दादा दादी तो हैं ही बच्चा पालने के लिए। आखिर उनकी भी कुछ जिम्मेदारी तो बनती ही है। और यदि यह भी न हुआ तो क्रच और प्ले स्कूल ज़िन्दाबाद! इसलिए तो आजकल बच्चा एक साल का हुआ नहीं की लोग उसे प्ले स्कूल में डालने के विषय में सोचने लगते हैं। क्यूँ? क्यूंकि वहाँ जाएगा तो जल्दी जल्दी खाना-पीना/पढ़ना लिखना /हँसना बोलना सब सीख जाएगा। अरे कोई यह बता दे मुझे, इतनी भी क्या जल्दी है भाई। बच्चा है…समय आने पर सब अपने आप ही सीख जाएगा। मगर उफ़्फ़ आज कल इन फिजूल बातों के लिए समय किसके पास है।

 अब बताइये भला यह भी कोई बात हुई। नन्ही सी जान जो अभी तक ठीक तरह से अपना नाम भी नहीं जानती/जानता उसे स्कूल के बोझ तले डालने के विषय में सोचने लगते है लोग। क्या यह सही है? माता-पिता का अहम एक मासूम बच्चे को झेलना पड़ता है और कहा यह जाता है कि हम जो कुछ कर रहे हैं उसी के लिए तो कर रहे हैं। वही तो है हमारा सब कुछ। जबकि वास्तविकता तो यह है कि अपने-अपने अहम के चलते न माँ झुकने को तैयार है न पिता। और इस सब के बीच पिस रहा है मासूम बचपन और हम मना रहे हैं बाल दिवस। वाह !!! क्या खूब बाल दिवस है यह…कोई बताएगा क्या कि यह कैसा बाल दिवस है।

बातें अपने मन की …

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कभी सुना है किसी व्यक्ति को दीवारों से बातियाते हुए ? सुना क्या शायद देखा भी होगा। लेकिन ऐसा कुछ सुनकर मन में सबसे पहले उस व्यक्ति के पागल होने के संकेत ही उभरते है। भला दीवारों से भी कोई बातें करता है! लेकिन यह सच है। यह ज़रूरी नहीं कि दीवारों से बात करने वाला या अपने आप से बात करने वाला हर इंसान पागल ही हो या फिर किसी मनोरोग का शिकार ही हो। मेरी दृष्टि में तो हर वक्ता को एक श्रोता की आवश्यकता होती है। एक ऐसा श्रोता जो बिना किसी विद्रोह के उनकी बात सुने। फिर भले ही वह आपकी भावनाओं को समझे न समझे मगर आपके मन के गुबार को खामोशी से सुने। शायद इसलिए लोग डायरी लिखा करते हैं। ताकि अपने मन को पन्नों पर उतारकर खुद को हल्का महसूस कर सकें। जिस प्रकार मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज के बिना जीवित नहीं रह सकता। ठीक उसी प्रकार मनुष्य के लिए एकांत भी उतना ही प्रिय है जितना उसके लिए समाज में रहना। क्यूंकि एकांत में ही व्यक्ति अपने आप से बात कर पाता है। ‘कोई माने या ना माने’ अपने आप से बातें सभी करते हैं। मगर स्वीकार कोई-कोई ही कर पाता है। न जाने क्यूँ अक्सर लोग इस बात को स्वीकार करने से हिचकिचाते हैं। शायद उन्हें ऐसा लगता हो कि यदि वह यह बात स्वीकारेंगे तो कहीं लोग उन्हें पागल न समझलें… नहीं ? है ना यही वजह है न!

लेकिन होता यही है। एकांत पाते ही हम अपने आप से बातें करते हैं। अपने जीवन से जुड़े भूत वर्तमान और भविष्य के विषय में सोचते हुए मन ही मन बहुत गहरा चिंतन मनन चलता है हमारे अंदर जिसे हम किसी अन्य व्यक्ति से सांझा नहीं कर पाते। इस दौरान कभी हम चुप की मुद्रा में अपने मन के अंतर द्वंद पर सोच विचार करते रहते है, तो कभी बाकायदा अपने आप से बात भी करते हैं जैसे हमारे सामने कोई व्यक्ति खड़ा हो और हम उसे अपने मन की बातें बता रहे हो। ठीक वैसे ही जैसा सिनेमा में दिखाया जाता है। बस फर्क सिर्फ इतना होता है कि सिनेमा में हमें अपना मन साक्षात अपने रूप में दिखाया जाता है। किन्तु वासत्व में ऐसा नहीं होता। यूं भी वास्तविकता हमेशा ही कल्पना से विपरीत होती है। इसलिए वास्तव में तो हम अपने सामने रखी हुई वस्तु को ही अपना अन्तर्मन मन समझ कर बातें करने लगते है। फिर चाहे वह वस्तु कोई दर्पण हो या फिर दरो दीवार उस वक्त उस सब से हमें कोई अंतर नहीं पड़ता ! क्यूंकि तब हमें अचानक ही ऐसा महसूस होने लगता है कि वह हमारे ऐसे खास मित्र हैं जो हमारे मन की पीड़ा हमारे अंदर चल रहे अंतर द्वंद को भली भांति समझ सकते हैं जिनके समक्ष हम अपने मन की हर एक कोने में दबी ढकी छिपी बात रख सकते है। ऐसे में हम अपने मन के अंदर छिपी हर गहरी से गहरी बात भी उनके समक्ष रख देते हैं। “ऐसा पता है क्यूँ होता है” ? क्यूंकि इंसान सारी दुनिया से झूठ बोल सकता है मगर खुद से कभी झूठ नहीं बोल सकता।

लेकिन जब कोई व्यक्ति भावनात्म रूप से किसी किसी बेजान चीज़ के प्रति अपना संबंध स्थापित करले तब क्या हो ? जैसे अक्सर एक ही शहर में रहते हुए जब हमें उस शहर से एक गहरा लगाव हो जाता है या फिर एक ही घर में वर्षों से रहते हुए जब हमारा उस घर से एक रिश्ता बन जाता है तब अचानक ही किसी कारणवश हमें उन्हें छोड़ना पड़े उस वक्त जो दुख जो पीड़ा होती है उसके चलते यदि हम उस शहर या उस घर को उपहार स्वरूप कुछ देना चाहें जैसे जाते वक्त उस घर को उपहार स्वरूप हम उसे सजाकर छोड़े यह उसके दरो दीवार पर कोई ऐसी निशानी छोड़ें जिसे सदा-सदा के लिए वह घर हमारी स्मृतियों में जीवित रहे और हम उस घर की स्मृतियों में जीवित रहे तो उसे क्या कहेंगे आप क्या उसे पागलपन की श्रेणी में रखा जान चाहिए या फिर उस भावना की कदर करते हुए उसका सम्मान किया जाना चाहिए? इस विषय में आप क्या सोचते हैं ज़रा खुलकर बताइये।

एक जीवन ऐसा भी …

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आज सुबह उनींदी आँखों से जब मैंने अपनी बालकनी के बाहर यह नज़ारा देखा तो मुझे लगा शायद आँखों में नींद भरी हुई होने के कारण मुझे ठीक से दिखाई नहीं दे रहा है। इसलिए स्थिर चीज भी मुझे चलती हुई सी दिखाई दे रही है। मगर फिर तभी दिमाग की घंटी बजी और यह ख़्याल आया कि चाहे आँखों में जितनी भी नींद क्यूँ न भरी हो! मगर नशा थोड़ी न किया हुआ है कि एक साथ इतनी सारी सफ़ेद काली वस्तुएं इधर उधर घूमती सी नज़र आने लगें। तब लगा शायद आँखों का धोखा होगा यह सोचकर आँखें मलते हुए जब ठंडे पानी से अपना चेहरा धोया तब जाकर साफ-साफ नज़र आया कि यह काली सफ़ेद कोई वस्तु नहीं है। बल्कि जीती जाति भेड़ बकरियाँ है। यह नज़ारा मेरे चौथे माले के मकान की बालकनी से काफी दूर का नज़ारा है। इसलिए इन भेड़ बकरियों का शोर मुझ तक नहीं आ पा रहा है। मगर इनकी कदम ताल को मैं बखूबी देख सकती हूँ। लेकिन मैं हैरान इसलिए हूँ क्यूंकि जहां गयी रात तक केवल हरा मैदान था, वहाँ आज सुबह एक गडरिये ने ना सिर्फ अपनी भेड़ बकरियों के साथ अपितु अपने पूरे परिवार के साथ वहाँ अपना डेरा जमाया हुआ है!

गडरिया अर्थात भेड़-बकरियाँ चराने वाला ऐसे लोग सामान्यता किसी गाँव या फिर उसके आसपास के इलाके में ही देखने को मिलते है और आज के बच्चों के लिए तो यह केवल उनके पाठ्यक्रम की पुस्तक में किसी कहानी का (पात्र) मात्र ही होता है। इसे साक्षात देखना तो शायद आज के बच्चों के लिए एक बड़ी उपलब्धि हो।

खैर जब आज के इस आधुनिक युग में मुझे इसे यहाँ शहर में यूं घूमते देखकर अचरज हो रहा है तो फिर बच्चों की तो बात ही क्या…तभी सहसा मेरी नज़र पड़ी मैदान के ठीक बीचों बीच लगे उस प्लास्टिक के तम्बू पर जो बांस की छोटी-छोटी चार लकड़ियों पर लगभग यूं खड़ा है जैसे कोई अपंग या लाचार इंसान बस गिरने की कगार पर ही खड़ा हो। तब उसे देखकर मेरे मन में रह रहकर यह ख़्याल आ रहा था कि आखिर इस तम्बू का फायदा क्या है। यह तो केवल किसी साधारण से पेड़ की तरह ही है। जो सिर्फ मौसम की मार से आपको ज़रा देर के लिए गीला होना से बचा सकता है मगर सुरक्षा नहीं कर सकता। क्यूंकि उस तम्बू में केवल सर छिपाने के लिए छत है मगर आजू बाजू से हवा के बचाव हेतु आड़ तक नहीं है। ऐसे में बरसाती ठंडी हवा और मैदान की कीचड़ में पलने वाले तरह-तरह के जहरीले जीव जन्तु के साम्राज्य के बीच भला कोई इंसान कैसे रह सकता है। वह भी अपने इतने सारे जानवरों के साथ क्यूंकि भले ही जानवर ही सही मगर धूप, हवा, पानी, गर्मी से बचाव तो उन्हें भी चाहिए ही होता है और इस गडरिये के पास तो ‘खुद अपना सिर छिपाने के लिए जगह नहीं है’ फिर यह भला अपने जानवरों क्या देगा। एक दो जानवर हो तो फिर भी बात समझ में आती है। मगर यहाँ तो भेड़-बकरियों की पूरी बारात है।

ऐसे में उसका तम्बूनुमा मकान या घर जो भी कह लीजिये देखकर मुझे लगता है कि आखिर क्या मजबूरी रही होगी इस इंसान कि जो रातों रात इसे अपना मकान छोड़कर यहाँ इस मैदान में यूं अपना डेरा जमाना पड़ा होगा। ‘पता नहीं पहले भी इसका अपना घर रहा भी होगा या नहीं’। या सदा से ही यह ऐसा जीवन व्यतीत करता आया है। कैसा होगा इसका जीवन! भेड़-बकरियों के भोजन के लिए तो फिर भी इस पृथ्वी ने अपनी धानी चुनर फैला रखी है। मगर यह इंसान क्या खाता होगा? क्या जरिया होगा इसकी कमाई का, कैसे पालता होगा यह अपना और अपने परिवार वालों का पेट। क्या रोज़ अपनी एक बकरी या भेड़ कर देता होगा किसी कसाई के हवाले ? या फिर कुछ और करता होगा। क्यूंकि आजकल रमज़ान का वक्त है कमाई अच्छी होने के दिन हैं। मगर क्या इसे ज़रा भी प्यार नहीं होगा अपनी भेड़ों-बकरियों से ? ऐसे न जाने कितने सवाल मेरे दिल पर हर रोज़ दस्तक देते हैं मगर फिर अगले ही पल दिमाग अपनी राय देकर इन सभी सवालों का मुंह बंद कर देता है। यह कहकर कि भूख और गरीबी के आगे इंसान को जानवर बनते देर नहीं लगती। एक बार इंसान अकेला भूखा रहकर गुज़र कर सकता है। मगर अपने पूरे परिवार को यूं रोज़-रोज़ भूख से लड़ता हुआ नहीं देख सकता। इसलिए बहुत संभव है कि इस मानव की मानवता को भी इस भूख और गरीबी का अजगर निगल गया हो।

यह सब महज मेरे मन की एक सोच है। सच्चाई क्या है मैं नहीं जानती। कई बार मेरा मन किया कि मैं जाकर मिलूँ उससे, ”पूछूं कि वह यहाँ यूं इस तरह से क्यूँ जी रहा है”। क्या मजबूरी है! क्या कहानी है उसकी! जिसने उसे इस तरह सड़क पर रहने के लिए मजबूर कर दिया है। फिर लगता है कहीं अंजाने में उसके जीवन की किसी दुखती रग को न दबा दूँ। कहीं वो मुझे गलत न समझ बैठे। बस यही सब सोचकर रोज़ चुप बैठ जाती हूँ और एक मूक दर्शक बनी देखती रहती हूँ हर रोज़ उसका यह अंतहीन संघर्ष भरा जीवन। जिसमें संघर्ष है, भूख है, गरीबी है मगर हौसला फिर भी बुलंद है कि कभी तो इस रात की सुबह होगी।

जाने कब समझेंगे हम…!

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बात उस समय कि है जब इंसान अपनी निजी एवं अहम जरूरतों के लिए सरकार और प्रशासन पर निर्भर नहीं था। खासकर पानी जैसी अहम जरूरत के लिए तो ज़रा भी नहीं। उस वक्त शायद ही किसी ने यह सोचा होगा कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब पानी भी बेचा और खरीदा जायेगा। हाँ यह बात अलग है कि तब जमींदारों की हुकूमत हुआ करती थी। निम्नवर्ग का जीना तब भी मुहाल था और आज भी है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब जमींदार गरीबों को लूटा करते थे। आज यह काम सरकार और प्रशासन कर रहे हैं। रही सही कसर बैंक वाले पूरी कर रहे हैं। तो कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि तब से आज तक गरीब किसान की किस्मत में सदा पिसना ही लिखा है।

मगर सोचने वाली बात यह है कि इतनी परेशानियाँ, दुःख तकलीफ सहन करने के बाद भी कभी इंसान ने जंगल काटने के विषय में नहीं सोचा। क्यूँ ! क्योंकि पहले हर कोई यह भली भांति जानता था कि यह जंगल ही हमारे जीने का सहारा है जो हमें न सिर्फ रोटी देते है बल्कि हमारी सभी अहम जरूरतों की पूर्ति भी करते है। यह पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं, यादों का घरौंदा हुआ करते थे। क्या आपको याद नहीं, वो बचपन के खेल जिनमें इन पर वो पल-पल चढ़ना उतरना, तो कभी इनसे घंटों बतियाना वो सुख दुःख में इन्हें गले लगा वो हँसना वो रोना, वो नीम की निबोली, वो आम के पत्ते, वो बरगद की बाहें, वो अमरूद थे कच्चे।

मगर अब सब कुछ बस क़िस्से और कहानियों में क़ैद होकर रह गया। क्यूँ क्योंकि आज ऐसा नहीं है। आज तो नज़र उठाकर देखने पर जहां तक नज़र जाती है वहाँ तक केवल कंक्रीट के जंगल ही दिखाई देते है। फिर चाहे उसके लिए तापमान का बढ़ता प्रकोप ही क्यूँ ना झेलना पड़े या पानी का अभाव। किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता, इसलिए आज हर इमारत हर सोसाइटी में जल का अभाव है ऊपर से ठेकेदार रोबदार आवाज में कहता है अपनी सोसाइटी में तो पाँच से छः बोरवेल है और यदि फिर भी कभी जरूरत पड़ जाये तो टैंकर मँगवा लेते है कुल मिलाकर आपको कभी पानी का अभाव नहीं झेलना पड़ेगा। इस पर भी जब उनसे कहो यदि सभी इसी तरह लगातार बोरवेल लगवाते रहे तो एक दिन धरती के अंदर का सारा जल सूख जाएगा फिर क्या करेंगे तो कहता है सच कल किसने देखा अभी अपनी सोसाइटी में तो पानी है फिर बाकी जगह क्या है क्या नहीं उस से अपने को क्या। सच कितना स्वार्थी हो गया है आज का इंसान जिसे केवल अपनी स्वार्थपूर्ति से मतलब है। फिर चाहे वो इमारतें बनाने वाले ठेकेदार हों या आज कल की सरकार फिर भले ही उसका खामियाजा पूरी मानव जाति को ही क्यूँ ना भोगना पड़े। सब का बस एक ही राग है ‘पैसा फेंक तमाशा देख’ ऐसे हालातों में आज जिसके पास पैसा है उसके पास निजी जरूरतों जैसे रोटी कपड़ा और मकान के साथ-साथ बिजली पानी जैसी अहम जरूरतों की पूर्ति भी है। इसका अर्थ यह निकलता है कि पानी की कमी नहीं है। मगर मिलता उन्हें ही है जिनके पास पैसा है और जिनके पास पैसा नहीं हैं उन बेचारों की ज़िंदगी तो खाने कमाने के चक्करों में ही निकल जाती हैं। उनके घरों में तो रोज़ चूल्हा जलना ही उनकी अहम जरूरतों की पूर्ति के बराबर है।

क्या यही है एक विकासशील देश की पहचान ? आज भी मैं देख रही हूँ एक ओर खड़ी तीस-तीस माले की बड़ी-बड़ी इमारतें जिनमें सभी सुख सुविधाओं के साथ बिजली चले जाने पर पावर बैकप की सुविधा भी उपलब्ध है। मगर उन विशाल एवं भव्य इमारतों के ठीक सामने है निम्नवर्ग की अँधेरी कोठरी। जहां एक और साँझ ढलते ही पूरी इमारत रोशनी से नहा जाती है। वहीं दूसरी और उस सामने वाली कोठरी में एक दिया तक नहीं होता जलाने के लिए। क्यूँ ? क्यूंकि बिजली का बिल भरने लायक उनकी कमाई नहीं होती। नतीजा वह बिजली की चोरी करते हैं और टेक्स के नाम पर खामियाजा आम आदमी (मध्यम वर्ग) भरता है। तो ज़रा सोचिए उन गाँवों का क्या हाल होता होगा जो आज भी बिजली से वंचित हैं।

अब बात आती है पानी की ‘जल ही जीवन है’ यह सभी जानते है और मानते भी है। मगर फिर भी जल को बचाने का प्रयास कोई नहीं करता। न बड़ी-बड़ी इमारतों के छोटे-छोटे मकानों में रह रहे लोग और ना ही निम्नवर्ग के लोग। पानी की पूर्ति की चिंता जब सरकार को नहीं तो फिर भला और कोई कैसे करेगा। क्योंकि उन्हें तो पानी की कमी है नहीं और जिन्हें है उन्हें भी पानी की बचत से कोई मतलब नहीं है। उन्हें बस पानी मिलना चाहिए। बचत हो, न हो, इससे उन्हें कोई मतलब नहीं होता। उदाहरण के तौर पर मेरे घर की काम वाली बाई को ही ले लीजिये। उसे बर्तन साफ करने और झाडू पोंछे के लिए नल से बहता तेज़ धार वाला पानी ही चाहिए। रखे हुए पानी से काम करने में उसे एतराज़ है। क्यूँ ! क्योंकि उसमें बहुत कष्ट होता है और समय भी ज्यादा लगता है। उसका कहना है कि नल खुला रहे तो बर्तन जल्दी साफ होते हैं। फिर उसके लिए चाहे जितने लीटर पानी बहे तो बह जाये उसे उससे कोई मतलब नहीं।

इतना ही नहीं घर में रखे भरे हुए पानी पर भी उसे लालच आता रहता है। वैसे चाहे वो दिन में शायद एक बार नहाने के बाद मुँह भी न धोती हो। मगर खुद को जरूरत से ज्यादा साफ सुथरा दिखाने के लिए उसे पच्चीस बार हाथ पैर धोने होते है। कुल मिलाकर जब तक सामने दिख रहा भरा हुआ पानी खत्म नहीं हो जाता, उनका भी काम खत्म नहीं होता। यह सिर्फ मेरी नहीं बल्कि हर घर की समस्या है। और जब समझाने की कोशिश करो तो उनका मुँह फूल जाता है। फिर जब खुद के घर के लिए कार्पोरेशन के पानी हेतु लंबी लाइन में लगनी होती है   तब पानी की अहमियत समझ आती है। मगर सिर्फ कुछ घंटों के लिए अगले ही पल से फिर वही ‘ढाक के तीन पात’ हो जाते है। इसी तरह हर रोज़ आम लोग पानी का अभाव झेलते रह जाते है।                    

पागल होना,शायद सामान्य होने से ज्यादा बेहतर है…!

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यूं तो एक पागल व्यक्ति लोगों के लिए मनोरंजन का साधन मात्र ही होता है। लोग आते हैं उस पागल व्यक्ति के व्यवहार को देखते है। उस पर हँसते और उसका परिहास बनकर अपने-अपने रास्ते निकल जाते है। इस असंवेदनशील समाज से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है। कभी-कभी सोचती हूँ तो लगता है कैसा होता होगा पागल होना। क्या महसूस करता होगा कोई पागल। भले ही कोई पागल हो किन्तु उसका दिमाग तो फिर भी काम करता ही है। क्या सोचता होगा वह इंसान जिसे दुनिया की नज़रों में पागल घोषित कर दिया गया हो।

खासकर वह पागल व्यक्ति जिसे पागलखाना भी नसीब न हुआ हो। जो सड़क पर दर-दर की ठोकरें खाकर भी दुःखी प्रतीत नहीं होता। लोगों के मनोरंजन और परिहास का पात्र बने रहने पर भी जिसे कभी किसी से कोई शिकायत नहीं होती। किसी पागल व्यक्ति का मज़ाक उड़ाने तक तो फिर भी बात समझ में आती है। किन्तु यदि वह पागल व्यक्ति कोई स्त्री हो तो मुझे दुःख और भी ज़्यादा होता है। इसलिए नहीं कि वह एक स्त्री है। बल्कि इसलिए कि इस बेरहम समाज को उस स्त्री के पागल होने पर भी दया नहीं आती। उसका दर्द उसका दुःख नज़र नहीं आता। अगर कुछ नज़र आता है! तो वह है केवल उसका फटे कपड़ों से झाँकता हुआ शरीर। क्योंकि भूखे कुत्तों को तो बस हड्डी से मतलब होता है। फिर चाहे वो हड्डी किसी की भी क्यूँ ना हो।

खैर आजकल तो लोग छोटी-छोटी बच्चियों को भी नहीं छोड़ते। यहाँ तो फिर भी एक पागल स्त्री की बात हो रही है। फिल्मों के अलावा मैंने कभी नहीं देखा कि कभी कोई इंसान किसी पागल व्यक्ति का तन ढ़क रहा हो या उसे खाना खिला रहा हो। हालांकी दुनिया में सभी बुरे नहीं होते। निश्चित ही ऐसे दयावान और संवेदनशील व्यक्ति भी होते ही होंगे। इसमें कोई दो राय नहीं है। 

कितनी अजीब बात है ना ! इस दुनिया में इंसान से बड़ा जानवर और कोई नहीं है। फिर भी एक इंसान को इंसान से ही सबसे ज्यादा डर लगता है। फिर चाहे वह इंसान कोई चोर, डाकू लुटेरा या हत्यारा ही क्यूँ न हो या फिर कोई पागल व्यक्ति हो। बाकी सबसे डरने का अर्थ तो फिर भी समझ में आता है। लेकिन एक पागल इंसान से भला क्या डरना। मुझे तो बहुत आश्चर्य होता है जब कोई व्यक्ति विशेष रूप से कोई स्त्री जब यह कहती है कि मुझे तो शराबियों से ज्यादा पागलों से डर लगता है। ‘अरे पागलों से क्या डरना’! वह बेचारे तो पहले ही अपने होश खो चुके बेबस इंसान है। अव्वल तो किसी से भी डरने की जरूरत ही नहीं होती। फिर भी हर इंसान को किसी न किसी से डर लगता ही है। किन्तु फिर भी मैंने अधिकतर स्त्रियॉं को यह कहते सुना है कि उन्हें नशे में धुत्त लोगों से ज्यादा पागल व्यक्ति से डर लगता है।

मेरी समझ से ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारे मन में पागल व्यक्ति के लिए एक निश्चित परिभाषा बैठी हुई है कि ‘अरे पागल का क्या भरोसा’ जाने क्या करे। जबकि दूसरी और हर समझदार इंसान यह बात भली भांति जानता है कि हर पागल एक सा नहीं होता अर्थात आक्रामक नहीं होता। जबकि वह पागल व्यक्ति किसी से कुछ भी न बोले। केवल अपनी ही धुन में रहता हो। फिर भी वो एक अकेला इंसान सबकी नज़रों में खटकता रहता है।

जबकि उन डरने वाली स्त्रियों के स्वयं अपने ही परिवार में दारू पीकर रोज़ मारपीट का शिकार होती हैं। गाली गलौच के कारण घर में रोज़ महाभारत होता है। जिसका बच्चों पर भारी मात्र में बुरा प्रभाव पड़ता है। लेकिन इस सबसे उन्हें डर नहीं लगता है। मगर हर उस चीज़ से डर लगता है जो उन्हें ज़रा भी नुक़सान नहीं पहुँचाती। जैसे किसी इंसान की लाश…मेरी नज़र में तो डर ने लायक ज़िंदा इंसान होते है। मुर्दे बिचारे किसी का क्या बिगाड़ लेंगे। मगर फिर भी लोग मुरदों से ज्यादा डरते है। यह सब देखकर तो लगता है, हम समझदारों से अच्छे तो यह पागल इंसान ही है। कम से कम दुनिया की परवाह किए बिना अपनी दुनिया में मस्त तो रहते हैं। बहुत पहले कभी लगता था कि ‘ईश्वर ने यह कैसा अन्याय किया है इन इंसानों के साथ’! जो इन्हें पागल बना दिया।

लेकिन आज जब कभी किसी पागल इंसान को देखती हूँ तो दिल से यह नहीं निकलता कि ‘हे ईश्वर इन्हें ठीक कर दे’।बल्कि अब तो यही फ़रियाद निकलती है कि ”हे ईश्वर बुद्धिजीवियों को थोड़ी सद्बुद्धि दे”। ताकि हम ऐसे लोगों का परिहास बनाने के बजाए उनकी सहायता कर सकें। या कम से कम जो लोग विभिन्न प्रकार के मनोरोगों से जूझ रहे हैं और आत्महत्या करने पर विवश हो रहे हैं हम उन्हें ही यह एहसास दिला सके कि इस दुनिया में ‘जीना मौत को गले लगाने से ज्यादा आसान है’। क्योंकि ईश्वर की बनाई यह दुनिया वास्तव में खूबसूरत है और जीने लायक भी है। अगर कुछ बुरा है, तो वह है ‘चंद बुरे लोग’। तो उन चंद बुरे लोगों के कारण भला कोई मासूम ज़िंदगी क्यूँ अंतिम साँस ले !!!    

Mhare Anubhav